गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

स्थानीय सरकार क्या हैं? Sthaniya Sarkar Kya Hai


स्थानीय सरकार क्या हैं? Sthaniya Sarkar Kya Hai

Sthaniya Sarkar Kya Hai

sthaniya sarkar ka mahatva (Political Science)



भारत में त्रिस्तरीय सरकार की व्यवस्था है। केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार एवं स्थानीय सरकार। स्थानीय स्तर की सरकार को स्थानीय सरकार कहा जाता है। ग्राम पंचायत, नगरपालिका आदि स्थानीय सरकार के उदाहरण है।

  • प्राचीन काल में भारत पंचायत की ऐसी व्यवस्था थी जिसमें पंचायत के सदस्यों को समाज में न्याय करने वाले लोगों के रूप में ईश्वर सदृश सम्मान प्राप्त था। स्थानीय प्रशासन, शान्ति व्यवस्था औऱ विकास में ग्राम पंचायतों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है इसलिए भारत में पंचायती राज व्यवस्था को लागू किया गया है तथा पंचायती राज व्यवस्था के सुचारु रूप से कार्यान्वयन एवं ग्रामीण विकास की आवश्यकता को देखते हुए भारत सरकार के अन्तर्गत पंचायती राज मनत्रालय के रूप में एक अलग मन्त्रालय का प्रावधान किया गया है।
  • अंग्रेज चाहते थे कि प्रशासन से संबंधित कार्य यथासम्भव उनके राज्य कर्मचारियों के हाथों कें रहे। इसके परिणामस्वरूप, स्थानीय स्वशासन ग्राम पंचायत का अस्तित्व धीरे धीरे समाप्त होने लगा। फिर भी प्रशासनिक स्तर को छोड़ कर यदि बात की जाए तो सामाजिक स्तर पर प्रत्येक जाति अथवा वर्ग में अपनी अलग अलग पंचायते बनी रहीं जो सामाजित जीवन कों नियन्त्रित करती थीं। 
  • पंचायत की व्यवस्था एवं नियमों का उल्लघंन करने वाले को कठोर दण्ड दिया जाता था। इन परिस्थितियों को देखते हुए अंग्रेजी सरकार ने भारत सरकार के अधिनियम-1919 के अनुसार प्रान्तीय सरकारों को कुछ अधिकार दिए जिसके फलस्वरूप 1920 के आस पास सभी प्रान्तों में ग्राम पंचायत अधिनियम बनाए गए तथा सभी प्रान्तों मे पंचायतों का निर्माण किया गया तथा उन्हें सीमित अधिकार भी दिए गए।
  • ब्रिटिश काल में ग्राम पंचायत जनस्वास्थ्य, स्वच्छता, चिकित्सा, जल विकास, सड़को तालाबों, कुँओ आदि की देखभाल करती थी, इसके अतिरिक्त उऩ्हें न्याय संबंधी कुछ अधिकार भी प्राप्त थे। इन सबके बावजूद ब्रिटिस काल में ग्रामों से सही पंचायत व्यवस्था का अभाव ही रहा।
  • 1947 में स्वतन्त्रता के बाद पंचायती राज व्यवस्था बनाने के प्रयास तेज हो गए। भारतीय संविधान में पंचायत के गठन के लिए प्रावधान किया गया।
  • भारतीय संविधान में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अन्तर्गत कहा गया है राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठाएगा एवं उसको ऐसी शक्तियाँ औऱ अधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने के योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों।
  • ग्रामीण विकास के लिए एक सुनियोजित कार्यक्रम एवं व्यवस्था पर विचार विमर्श करने के लिए भारत सरकार ने बलवन्त राय मेहता की अध्यक्षता में 1956 मे एक समिति का गठन किया। बलवन्त राय मेहता समिति ने अपनी संस्तुतियाँ 1957 में सरकार को दे दीं।
  • 12 जनवरी 1958 को राष्ट्रीय विकास परिषद् ने बलवन्त राय मेहता समिति के प्रजातन्त्रिक विकेन्द्रीकरण के प्रस्तावों को स्वीकार करते हुए राज्य से इस कार्यान्वित करने के लिए कहा। इसके बाद 2 अक्टूबर 1959 को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा पंचायती राज्यों का शुभारम्भ राजस्थान के नागौर जिले में किया गया था।
  • 11 अक्टूबर 1959 को आन्द्र प्रदेश मे पंचायती राज प्रारम्भ किया गया।
  • पंचायती राज को अधिक प्रभावी बनाने के लिए 1977 में अशोक मेहता की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया जिसने 1978 में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। अशोक मेहता समिति के प्रस्तावों को सरकार ने स्वीकार नहीं किया, वर्तमान पंचायत व्यवस्थ बलवन्त मेहत समिति के प्रस्तावों पर आधारित है।
  • ग्राम पंचायत के सुचारु रूप में कार्य करने के लिए पंचायती राज से संबंधित अन्य बातों को संविधान में शामिल करने के लिए 1993 में संविधान में संशोधन 73वाँ औऱ 14वँ संशोधन किए गए।
  • 73वाँ संविधान संशोधन के द्वारा पंचायती राज के त्रिस्तरीय ढाँचे का प्रावधान कर प्रत्येक स्तर में एक तिहाई स्थानो पर महिलाओं के लिए एक आरक्षण की व्यवस्था की गई तथा इसका कार्यकाल पाँच वर्ष निर्धारित किया गया।
  • 74वाँ संविधान संशोधन नगरपालिकाओं से सम्बन्धित है जिसमें प्रावधान किया गया है कि नगरपालिकाएँ तीन प्रकार की होंगी नगर पंचायत, नगर परिषद् और नगर निगम। इन संस्थाओं में महिलाओँ के लिए एक तिहाई सीट तथा अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए भी कुछ सीट आरक्षित होंगी एवं इनका कार्यकाल पाँच वर्ष का होगा।
  • संविधान के 73वें तथा 74वें संशोधन द्वारा ग्यारहवीं अनुसूचीं मे कई विषयों को शामिल किया गया, जिसमें कृषि, भूमि-सुधार, लघु सिंचाई, पशुपालन, मत्स्य पालन, खादी ग्रामोघोग आदि प्रमुख हैं।

पंचायती राज व्यवस्था  ग्राम सभा - Panchayati Raj Kya Hai

  • ग्राम सभा एवं पंचायत के क्षेत्र में रहने वाले सभी वयस्कों की सभी होती है। एक गाँव या कुछ छोटे छोटे गाँवों को मिलकर पंचायत का निर्माण किया जाता है।
  • कई राज्यों मे हर गाँव की ग्राम सभा की बैठक अलग होती है।
  • कोई भी व्यक्ति जिसकी आयु 18 वर्ष या उससे ज्यादा होती है जिसे वोट देने का अधिकार प्राप्त हो औऱ जिसका नाम गाँव की मतदाता सूची में हो वह ग्राम सभा का सदस्य होगा।
  • ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा नियम सयम पर ग्राम पंचायत का चुनाव किया जाता है, जिसमें एक प्रधान अथवा सरपंच के अतिरिक्त कुछ पंच भी होते है। इस पंचों की संख्या 5 से लेकर 15 तक हो सकती है, ग्राम पंचायत का कार्यकाल सामान्यतः 5 वर्षों का होता है।
  • एक ग्राम पंचायत कई वार्डों छोटे छोटे क्षेत्रों मे बँटी हुई होती है। प्रत्येक वार्ड अपना एक प्रतिनिधि चुनता है जो वार्ड पंच के नाम से जाना जाता है। इसके साथ पंचायत क्षेत्र के लोग मिलकर सरपंच को चुनते है।
  • वार्ड पंच और सरपंच मिलकर ग्राम पंचायत का गठन पाँच साल के लिए करते है।
  • ग्राम पंचायत का एक सचिव होता है जो ग्राम सभा का भी सचिव होता है। सचिव का चुनाव नहीं होता, उसकी सरकार द्वारा नियुक्ति की जाती है। सचिव का काम है ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायत की बैठक और जो भी चर्चा एवं निर्णय हुए हो उनका रिकॉर्ड रखना होता है।
  • ग्रामि पंचायत पूरे गाँव के हित में निष्पक्ष रूप से कार्य कर सके इसमे ग्राम सभा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
  • ग्राम सभा की बैठक में ग्राम पंचायत अपनी योजनाएँ लोगों के सामने रखती है। ग्राम पंचायत को मनमाने ढंग से काम करने से रोक सकती है। साथ ही पैसों का दुरुपयोग एवं कोई गलत काम न हो, इसकी निगरानी भी करती है। इस तरह से ग्राम सभा चुने हुए प्रतिनिधियों पर नजर रखते और लोगों के प्रति उऩ्हें जिम्मेदार एवं जवाबदेह बनाने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

ग्राम पंचायत क्या हैं?

  • ग्राम पंचायत की नियमित रूप से बैठत होती है। उसका मुख्य काम उसके क्षेत्र में आऩे वाले गाँवों मे विकास कार्यक्रम लागू करवाना होता है।
  • ग्राम सभा ही पंचायत के काम को स्वीकृति देती है तभी पंचायत अपना काम कर पाती है।
  • कुछ राज्यों मे ग्राम सभाएँ काम करवाने के लिए समितियाँ बनाती है, उदाहरण के लिए निर्माण समिति। मान लीजिए कि गाँव मे एक सामुदायिक केन्द्र का भवन बनवाना है, तो यह काम निर्माण समिति करेगी। इन समितियों में कुछ सदस्य ग्राम सभा के होते है और कुछ पंचायत के। दोनों मिलकर गाँव के विकास के लिए काम करते है।

ग्राम पंचायत के कार्य क्या हैं? 

  • ग्राम पंचायत को मुख्यतः तीन कार्यों में अपना योगदान करन होता है।
  • ये कार्य है नागरिक सुविधाएं, समाज कल्याण के कार्य और विकास कार्य।
  • नागरिक सुविधाओँ के अन्तर्गत नागरिकों के उत्तम स्वास्थ्य औऱ जीवन के लिए सफाई, गन्दे पानी के निकास, पीने के स्वच्छ जल, सुविधाजनक आवागमन के रास्ते तथा प्रकाश की व्यवस्था के अतिरिक्त बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूलों की समुचित व्यवस्था भी ग्रामम पंचायत को करनी होती है।
  • समाज कल्याण के कार्यों के अन्तर्गत पंचायत के लोगों के जन्म एवं मृत्यु संबंधी आँकड़े रखने के साथ साथ कृषि विकास एवं पशुपालन मे भी ग्राम पंचायत की भूमिका अहम होती है।
  • ग्राम विकास के लिए ग्राम पंचायत सड़क, नाली, तालाब, पुस्तकालय, स्कूल, अस्पताल, सामुदायित भवन इत्यादि का निर्माण करवाती है।
  • सड़कों, नालियों, स्कूलों, भवनों, पानी के स्त्रोतों और अन्य सार्वजनिक उपयोग के भवनों का निर्माण औऱ रख रखाव का कार्य भी ग्राम पंचायत के द्वारा किया जाता है।
  • ग्राम पंचायत अपनी आय के लिए स्थानीय कर लगाती है उसे इकट्ठा करती है।
  • गाँव के लोगों को रोजगार देने संबंधी सरकारी योजनाएँ लागू करने की जिम्मेदारी भी ग्राम पंचायत ही करती है।

ग्राम पंचायत की आमदनी के स्त्रोत

  • घरों एवं बाजारों पर लगाए जाने वाले कर से मिलने वाली राशि।
  • विभिन्न सरकारी विभागों द्वारा चलाई गई योजनाओँ की राशि जो जनपद एवं जिला पंचायत द्वारा आती है।
  • समुदाय के काम के लिए मिलने वाले दान।

पंचायती राज व्यवस्था के स्तर

  • पंचायती राज व्यवस्था, जिसे स्थानीय स्वशासन भी कहा जाता है। इसके तीन स्तर है ग्राम पंचायत, पंचायत समिति एवं जिला परिषद्।
  • ग्राम पंचायत स्थानीय स्वशासन की निम्नतर स्तर की संस्था है। इसे पंचायती राजव्यवस्था को लोकतान्त्रिक सरकार की पहली सीढ़ी कहा जा सकता है।
  • ग्राम पंचायत ग्राम सभा के प्रति जवाबदेह होती है क्योंकि ग्राम सभा के लोग ही उसको चुनते हैं। पंचायती राज व्यवस्था मे लोगों की भागीदारी दो औऱ स्तरों पर होती है। ग्राम पंचायत के बाद दूसरा स्तर विकासखण्ड का होता है। इसे जनपद पंचायत या पंचायत समिति कहते है।
  • एक पंचायत समिति मे कई ग्राम पंचायते होती है।
  • पंचायत समिति के ऊपर जिला पंचायत या जिला परिषद् होती है। यह तीसरा स्तर होती है।
  • जिला परिषद् एक जिले के स्तर पर विकास की योजनाएँ बनाती है। पंचायत समिति की मदद से जिला परिषद् सभी पंचायतों मे आवण्टित राशि के वितरण की व्यवस्था करती है।
  • संविधान मे दिए हुए निर्देशों के आधार पर देश के हर राज्य मे पंचायत से जुड़े कानून बनाए है। इसीलिए संबंधी कानून हर राज्य में कुछ अलग अलग हो सकते हैं। इसके पीछे मुख्य विचार यही है कि अपने गाँव की व्यवस्था मे लोगों की भागीदारी बढ़े औऱ उन्हें अपनी आवाज उठाने के लिए ज्याद से ज्यादा मौका मिलें।

गाँव का प्रशासन कैसा होता हैं?

  • भारत मे छः लाख से अधिक गाँव है। उनकी पानी, बिजली, सड़क आदि की जरूरतों को पूरा करने के लिए गाँव के प्रशासन की व्यवस्था करनी पड़ती है।
  • सामान्यतः गाँव के छोटे मोटे झगड़ें का निपटारा सरपंच करता है। यदि समस्य बड़ी हो तो, पुलिस थाने में शिकायत की जाती है।
  • हर पुलिस थाने का एक कार्यक्षेत्र होता है जो उसके नियन्त्रण मे रहता है। लोग क्षेत्र में हुई चोरी, दुर्घटना, मारपीट, झगड़े आदि की रिपोर्ट उसी थाने में लिखवा सकते है। यह वहाँ के थानेदार की जिम्मेदारी होती है कि वह लोगों से घटना के बारे में पूछताछ करे, जाँच पड़ताल करे औऱ अपने क्षेत्र के अन्दर के मामलों पर कार्यवाही करें।
  • गाँवों की जमीन को नापना औऱ उसका रिकॉर्ड रखना पटवाली का मुख्य काम होता है, जो राजस्व विभाग का एक कार्मचारी होता है। अलग अलग राज्यों में इसे अलग अलग नाम जैसे पटवाली, लेखपाल, कर्मचारी, ग्रामीण, अधिकारी, कानूनगो आदि के नाम से जाना जाता हैं।
  • किसनों को अकसर अपने खेत के नक्शे औऱ रिकॉर्ड की जरूरत पड़ती है। इसके लिए उनको कुछ शुल्क देना पड़ता है। किसानों को उसकी नकल पाने का अधिकार है।

नगर प्रशासन (नगर निगम)-Nagar Nigam Kya Hai

  • नगर प्रशासन चलाने वाले संस्थान को नगर निगम कहते हैं। छोटे कस्बों मे इसे नगरपालिका कहते हैं।
  • नगर निमग का काम यह सुनिश्चित करना भी है कि शहर में बीमारियाँ न फैलें। यह स्कूल स्थापित करता है और उन्हें चलाता है। शहर में दवाखाने और अस्पताल चलाता है। यह बाग-बगीचों का रख रखाव भी करता है।

निगम पार्षद एवं प्रशासनिक कर्मचारी

  • शहर में अलग अलग वार्डो मं बाँटा जाता है और हर वार्ड से एक पार्षद का चुनाव होता है। नगर निगम के कुछ निर्णय ऐसे होते है जो सारे शहर को प्रभावित करते है। ऐसे जटिल निर्णय पार्षदों के समूह लिए जाते है। कुछ पार्षद मिलकर समितियाँ बनाते हैं, जो विभिन्न मुद्दों पर विचार विमर्श करके निर्णय लेती है। उदाहरण एक बस स्टैण्ड को बेहतर बनाना है या किसी भीड़भाड़ वाले बाजार का कचरा ज्यादा नियमित रूप से साफ करना है या फिर शहर के मुख्य नाले की सफाई होनी है। पार्षदों की समितियाँ ही पानी, कचरा जमा करने और सड़को पर रोशनी आदि कि व्यवस्था करती है।
  • जब एक वार्ड के अन्दर कोई समस्या होती है तो वार्ड के लोग पार्षद से सम्पर्क कर सकेत है। उदाहरण के लिए अगर बिलजी के खतरनाक तार लटक कर नीचे आ जाएँ तो स्थानीय पार्षद बिजली विभाग के अधिकारियों से बात करने में मदद कर सकते हैं।
  • जहाँ पार्षदों की समितियाँ एवं पार्षद विभिन्न मुद्दों पर निर्णय लेने का काम करते है वहीं उन्हें लागू करने का काम आयुक्त कमिश्नर और प्रशासनिक कर्मचारी करते है। आयुक्त और प्रशासनिक कर्मचारियों की सरकार द्वारा नियुक्ति की जाती है जबकि पार्षद निर्वाचित होते है।
  • चूँकि शहर का आकार बुहत बड़ा होता है, इसलिए नगर निगम को कई निर्णय लेने होते है। इसी तरह शहर को साफ रखने के लिए बहुत काम करना पड़ता है। ज्यादातर निगम पार्षद ही यह निर्णय लेते है नगर का कोई काम कैस और कहाँ होगा जैसे कि अस्पताल या पार्क कहा बनेगा आदि के कार्य।
  • सारे वार्डो के पार्षद मिलते है औऱ सबकी सम्मिलित राय से एक बजट बनाया जाता है। उसी बजट के अनुसार पैसा खर्च किया जाता है। पार्षद यह प्रयास करते है कि उनके वार्ड की विशिष्ट जरूरतें परिषद् के सामने रखी जा सकें। फिर ये निर्णय प्रशासनिक कर्मचारियों द्वारा क्रियान्वित किए जाते है।
  • शहर मे काम को अलग अलग विभागो मे बाँट देते है। जैसे जल विभाग होता है, कचरा जमा करने का विभाग, बागों की देखभाग का विभाग, सड़क व्यवस्था का विभाग इत्यादि।

नगर निगम की आय के स्त्रोत

  • नगर निगम अपने खर्च के लिए राशि अलग अलग तरीकों से इकट्ठा करता है इस राशि का बड़ा भाग लोगों द्वारा दिए गए कर टैक्स से आता है। कर वह राशि है जो लोग सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई सुविधाओं के लिए सरकार को देते है।
  • जिन लोगों के अनपे घर होते है उन्हे सम्पत्ति कर देना होता है औऱ साथ ही पानी एवं अऩ्य सुविधाओं के लिए भी कर देना होता है।
  • निगम के पास जितना पैसा आता है उसमें सम्पत्ति कर से केवल 25% 30% प्रतिशत पैसा ही आता है।
  • शिक्षा पर भी कर लगता है। दुकान या होटल पर भी कर देना पड़ता है।
  • सिनेमा देखने के लिए मनोरंजन कर भी देना पड़ता है।          

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