बुधवार, 15 अप्रैल 2020

जैन धर्म का इतिहास NCRT Notes | Jain Dharm Ka itihas

 Jain Dharm in Hindi History

Jain Dharm Ka itihas NCRT

Jain Dharm Ka itihas (History of India)

जैन धर्म का इतिहास NCRT Notes

  • भारत में जैन धर्म का संस्थापक कौन हैजैन शब्द जिन शब्द से निकला है जिसका अर्थ है विजेता, जैन धर्म में कुल 24 तीर्थकर हुए थे, इसके संस्थापक एवं प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव थे। 23वें तीर्थकर पार्श्वनाथ ने जैन धर्म को व्यवस्थित रूप प्रदान किया। इनका काल महावीर से 250ई.पू से माना जाता हैं। इनके अनुयायियों को निर्ग्रन्थ कहा जाता था। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार पार्श्वनाथ को 100 वर्ष की आयु मे सम्मेद पर्वत का निर्वाण प्राप्त हुआ।
  • जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक इसके 24वें तीर्थकर वर्धमान महावीर माने जाते थें। इनका जन्म 540ई.पू. में कुण्डग्राम (वैशाली) में हुआ था इनके पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक कुल के सरदार थे और माता त्रिशला लिच्छिवी राजा चेटक की बहन थी।
  • महावरी के बचपन का नाम वर्थमान था। इनका यशोदा नामक कन्या से विवाह हुआ, जिनसे अणोजा प्रियदर्शनी नामक पुत्री को जन्म दिया। प्रियदर्शनी का विवाह जामालि नामक क्षत्रिय से हुआ, जो महावीर का प्रथम शिष्य बना था।
  • महावीर ने 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग दिया। 12 वर्ष तक कठोर तपस्या एवं साधना के बाद 42 वर्ष की अवस्था में महावीर को जृम्भिकग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के किनारे साल वृक्ष के नीचे कैवल्य (सर्वोच्च ज्ञान) की प्राप्ती हुई।
  • कैवल्य प्राप्ति के बाद महावीर जिन (विजेता), केवलिन, अर्ह (योग्य), अर्हत (पूज्य) एवं निर्ग्रन्थ (बन्धन रहित) कहलाए। बौद्ध साहित्य में महावीर को निगण्ठनाथपुत्त कहा गया है
  • महावीर की क्षिक्षा सरल थी। उनके अनुसार सत्य जानने की इच्छा रखने वाले प्रत्येक स्त्री व पुरूष को अपना घर छोड़ देना चाहिए। उन्हें अहिंसा के नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए अर्थात् किसी भी जीव को न तो कष्ट देना चाहिए और न ही उसकी हत्या करनी चाहिए।
  • महावीर का कहना था- सभी जीव जीना चाहते हैं। सभी के लिए जीवन प्रिय हैं। महावीर ने अपनी शिक्षा प्राकृत भाषा में दी। यही कारण हैं कि साधारण जन भी उनके अनुयायियों की शिक्षाओं को समक्ष सकें। देश के अलग अलग हिस्सों में प्राक्त के अलग अलग रूप प्रचलित थे। प्रचलन क्षेत्र के आधार पर ही उनके अलग अलग नाम थे जैसे मगध में बोली जाने वाली प्राकृत, मगधी कहलाती थी।
  • जैन नाम से जाने गए महावीर स्वामी के अनुयायिय़ों को भोजन के लिए भिक्षा माँगकर जीलन बीताना होता था। उऩ्हें पूरी तरह से ईमानदार होना पड़ता था। चोरी न करने की उन्हें सख्त हिदायत थी। उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करना होता था। पुरुषों को वस्त्रों सहित सब कुछ त्याग देना पड़ता था। अधाकंश व्यक्तियों के लिए ऐसे कड़े नियमों का पालन करना बहुत कठिन था। फिर भी हजारों व्यक्तियों ने इस नई जीवन शैली को जानने औऱ सीखने के लिए अपने घरों को छोड़ दिया। कई अपने घरों पर ही रहे और भिक्षु-भिक्षुणी बने लोगों को भोजन प्रदान कर उनकी सहायता करते रहें। 
  • मख्यतः व्यापारियों ने जैन धर्म का समर्थन किया। किसानों के लिए इन नियमों का पालन करना अत्यन्त कठिन था क्योंकि फसल की रक्षा के लिए उन्हें कीड़े-मकौड़ो को मारना पड़ता था।
  • चम्पा की राजकुमारी चन्दना प्रथम जैन भिक्षुणी बनीं और चम्पा नगरी जैन धर्म का मुख्य केन्द्र बन गया।
  • महावीर ने अपने शिष्यों को 11 गणधारों में विभाजित किया था। इनमें से 10 गणधारों की मृत्यु महावीर के जीवनकाल में ही हो गई थी। उनके बाद केवल सुधार्मण ही जीवित था।
  • जैन धर्म के मुख्य उपदेशक को थेरा कहा जाता था।
  • बाद की सदियों में जैन धर्म उत्तर भारत के कई हिस्सों के साथ साथ गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक में भी फैल गया। महावीर तथा उनके अनुयायियों की शिक्षाएँ कई शताब्दियों तक मौखिक रूप में ही रहीं।
  • वर्तमान रूप में उपलब्ध जैन धर्म शिक्षाएँ लगभग 1500 वर्ष पूर्व गुजरात में वल्लभी नामक स्थाप पर लिखी गई थीं।
  • महावीर ने पाँच महाव्रतों के पालन का उपदेश दिया। ये पाँच महाव्रत हैं सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, एवं ब्रह्मचर्य। इनमें से शुरू के चार महाव्रत जैन धर्म के 23वें तीर्थकर पार्श्वनाथ के थे, अन्तिम महाव्रत ब्रह्मचर्य महावीर स्वामी ने जोड़ा। जैन धर्म अनीश्वरवादी हैं।



महावीर स्वामी परिचय | Mahavir Swami Biography in Hindi

  • जन्म—कुण्डलग्राम (वैशाली)
  • जन्म का वर्ष—540 ईं.पू
  • पिता—सिद्धार्थ (ज्ञातृक क्षत्रिया कुल)
  • माता—त्रिशला (लिच्छवि शासक चेटक की बहन)
  • पत्नी—यशोदा
  • गृह त्याग—30 वर्ष की आयु में
  • तपस्थल—जृम्भिक ग्राम (ऋजुपालिका नदी के किनारे)
  • कैवल्य—ज्ञान की प्राप्ति 42 वर्ष की अवस्था में
  • निर्वाण—468 ई.पू. (पावापुरी में)



  • कालान्तर में जैन धर्म दो सम्प्रदायों श्वेताम्बर एवं दिगम्बर में बँट गया। श्वेताम्बर सम्प्रदाय के अनुयायी श्वेत वस्त्र धारण करते हैं जबकि दिगम्बर सम्प्रदाय के अनुयायी वस्त्रों का परित्याग करते हैं।
  • महावीर स्वामी ने अपने उपदेश प्राकृत भाषा में दिये।


जैन महासंगीतियाँ Pratham jain mahasangiti

  • (संगीत—प्रथम—322 ई.पू.—298 ई.पू.) (स्थल—पाटलिपुत्र) (अध्यक्ष—स्थलूभद्र) (कार्य)—जैन धर्म दो भागों श्वेताम्बर एवं दिगम्बर में विभाजित)
  • (संगीत—द्वितीय—512 ई.पू.) (स्थल—वल्लभी) (अध्यक्ष—देव ऋद्धिगणि (क्षमाश्रमण) (कार्य)—धर्म ग्रन्थों को लिपिबद्ध किया गया)

विहार- जैन तथा बौद्ध

  • जैन तथा बौद्ध भिक्षु पूरे वर्ष एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते हुए उपदेश दिया करते थे। केवल वर्षा ऋतु में जब यात्रा करना कठिन हो जाता था तो वे एक स्थान पर ही निवास करते थे। ऐसे समय वे अपने अनुयायियों द्वारा उघानों मे बनवाए गए अस्थायी निवासों मे अथवा पहाड़ी क्षेत्रों की प्राकृतिक गुफाओं मे रहते थे।
  • जैसे जैसे समय बीतता गया भिक्षु भिक्षुणियों के स्वयं तथा उनके समर्थकों ने अधिक स्थायी शरण स्थलों की आवश्यकता का अनुभव किया। तब कई शरण स्थल बनाए गए जिन्हें विहार कहा जाता हैं। आरम्भिक विहार लकड़ी के बनाए गए तथा बाद में इनके निर्माण में ईंटो का प्रयोग होने लगा। पश्चिमी भारत में विशेषकर कुछ विहार पहाड़ियों को खोद कर बनाए गए।
  • प्रायः किसी धनी व्यापारी, राजा अथवा भू-स्वामी द्वारा दान मे दी गई भूमि पर विहार का निर्माण होता था। स्थानीय व्यक्ति भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए भोजन, वस्त्र तता दवाइयाँ लेकर आते थे जिसके बदले ये भिक्षु और भिक्षुणी लगों को शिक्षा देते थे। आगे जाने वाली शताब्दियों में बौद्ध धर्म उपमाहद्वीप के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ बाहरी क्षेत्रों में भी फैल गया।


 आश्रम व्यवस्था- जैन धर्म बौद्ध 

  • जैन धर्म बौद्ध धर्म जिस समय लोकप्रिय हो रहे थे लगभग उसी समय ब्रह्ममणों ने आश्रम व्यवस्था का विकास किया।
  • यहाँ आश्रम शब्द का तात्पर्य लोगों द्वारा रहने तथा ध्यान करने के लिए प्रयोग में आने वाले स्थान से नहीं है, बल्कि इसका तात्पर्य जीवन के एक चरण से हैं।
  • ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, तथा संन्यास नामक चार आश्रमों की व्यवस्था की गई।
  • ब्रह्मचर्य के अन्तर्गत ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य से यह अपेक्षा की जाती थी कि इस चरण के दौरान वे सादा जीवन बिताकर वेदों का अध्ययन करेंगे।
  • गृहस्थ आश्रम के अन्तर्गत उन्हें विवाह कर एक गृहस्थ के रूप में रहना होता था।
  • वानप्रस्थ के अन्तर्गत उन्हें जंगल मे रहकर साधना करनी थी। उन्हें सब कुछ त्यागकर संन्यासी बन जाना था।
  • आश्रम व्यवस्था ने लोगों को अपने जीवन का कुछ हिस्सा ध्याय में लगाने पर बल दिया।
  • प्रायः स्त्रियों को वेद पढ़ने की अनुमति नहीं थी औऱ उन्हें अपने पतियों द्वारा पालन किए जाने वाले आश्रमों का ही अनुसरण करता होता था।


ईरान में जरथुस्त्रवाद- जरथुस्त्र एक ईरानी पैगम्बर |  Parsi Religion

  • जिस समय भारत में बौद्ध एवं जैन धर्मों के प्रभाव मे वृद्धि हो रही थी, लगभग उसी समय ईरान मे जरथुस्त्रवाद का प्रसार हो रहा था।
  • जरथुस्त्र एक ईरानी पैगम्बर थे। उनकी शिक्षाओं का संकलन जेन्द-अवेस्ता ग्रन्थ में मिलता हैं।
  • जेन्द-अवेस्ता की भाषा तथा इसमें वर्णित रीति—रिवाज, वेदों की भाषा और रीति—रिवाजों से काफी मिलते—जुलते हैं।
  • जरथुस्त्र की मूल शिक्षा का सूत्र हैं (सद्—विचार, सद्—वचन तथा सद्—कार्य) हे ईश्वर बल, सत्य—प्रधानता एवं सद् विचार प्रदान कीजिए, जिनके जरिए हम शान्ति बना सकें।
  • एक हजार से अधिक वर्षों तक  जरथुस्त्रवाद ईरान का एक प्रमुख धर्म रहा। बाद में कुछ जरथुस्त्रवादी ईरान से आकर गुजरात और महाराष्ट्र के तटीय नगरों में बस गए। वे लोग ही आज के पारसियों के पूर्वज हैं।


भगवान महावीर स्वामी जैन संघ

  • महावीर तथा बुद्ध दोनों का ही मानना था कि घर का त्याग करने पर ही सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हो सकती हैं। ऐसे लोगों के लिए उन्होंने संघ नामक संगठन बनाया जहाँ घर का त्याग करने वाले लोग एक साथ रह सकें।
  • संघ में रहने वाले बौद्ध भिक्षुओं के लिए बनाए गए नियम विनयपिटक नामक ग्रन्थ में मिलते हैं। विनयपिटक से हमें पता चलता हैं कि संघ में पुरुषों और स्त्रियों के रहने की अलग अलग व्यवस्था थी। सभी व्यक्ति संघ में प्रवेश ले सकते थे हालाँकि संघ में प्रवेश के लिए बच्चों को अपने माता—पिता से, दासों को अपने स्वामी से, राजा के यहाँ काम करने वाले लोगों को राजा से तथा कर्जदारों को अपने देनदारों से अनुमति लेनी होती थी। एक स्त्री को इसके लिए अपने पति से अनुमति लेनी होती थी।
  • संघ में प्रवेश लेने वाले स्त्री—पुरूष बहुत सादा जीवन जीते थे। वे अपना अधिकांश समय ध्यान करने में बिताते थे और दिन में एक निश्चित समय में वे शहरों तथा गाँवों में जाकर भिक्षा माँगते थे। यही कारण है कि उन्हें भिक्षु तथा भिक्षुणी (भिखारी के लिए प्राकृत शब्द) कहा गया। वे आम लोगों को शिक्षा देते थे और साथ ही एक दूसरे की सहायता भी करते थे।
  • किसी तरह की आपसी लड़ाई का निपटारा करने के लिए वे प्रायः बैठकें भी किया करते थे। संघ में प्रवेश लेने वालों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, व्यापारी, नाई, मजदूर, गणिकाएँ तथा दास शामिल थे। इनमें से कई लोगों ने बुद्ध की शिक्षाओं के विषय में लिखा तथा कुछ लोगों ने संघ में अपने जीवन के विषय मे सुन्दर कविताओं की रचना भी की।



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